Tuesday, August 18, 2009

मिकी माउस का सफर

मिकी माउस का सफर.......



फंतासी और मनोरंजन की दुनिया का पर्याय बन चुका मिकी माउस इस वर्ष अपना 81 वां जन्मदिन मना रहा है। किसी भी व्यक्ति या कंपनी के तब दुगुनी खुशी का वक्त आता है जब उसका उत्पाद या चरित्र उसके नाम ज्यादा अपने नाम से जाना जाए। आज मिकी माउस की यही स्थिति है। वाल्ट डिज़्नी का यह ट्रेडमार्क उनके जीते-जी ही प्रसिद्धि अर्जित कर चुका था।

लाल जूते और पीले कपड़ों मे मिकी माउस डिज़्नी की अलग पहचान दर्ज कराता है। इसी रुप में मिकी माउस बच्चे-बूढ़ों में समान रुप से लोकप्रिय है। बीसवीं सदी के सबसे लोकप्रिय ब्रांडों में शुमार डिज़्नी ने करोड़ो दिलों मे राज़ करने वाले मिकी जैसे चरित्र की रचना कर एक अलग काल्पनिक दुनिया रच डाली। सन् 1923 में डिज़्नी ने ‘मोर्टाइमर माउस’ नामक कार्टून चरित्र की रचना की। फिर अपनी पत्नी की सलाह पर वाल्ट डिज़्नी ने सन् 1928 में ‘मिकी’ नाम दिया। इसमें और सुधार करते हुए आवाज दी तथा पहली बोलते-चलते कार्टून की शुरुआत की। एक तरह से ‘मिकी माउस’ कार्टून की दुनिया का वास्तविक जन्मदाता है।

पहली बार ‘स्टीमबोट विली’ फिल्म के जरिए मिकी माउस की शरारतें दुनिया के सामने आई। वर्ष 1929 में अमेरिकी मंदी के दिनों में डिज़्नी की इस रचना ने ऐसी फंतासी रची जिसमें हमेशा बूरे हारे और भलों की जीत हुई। यह भी संयोग ही है कि मिकी के 80 वें जन्मदिन पर भी अमेरिका फिर से आर्थिक मंदी की चपेट में है। मिकी ने थोड़े ही दिनों में घर-घर में जगह बना ली। शुरु में संगीत और बाद में टेक्नीकलर के प्रयोग से डिज़्नी ने मिकी माउस की काल्पनिक दुनिया को सजीव बना दिया।
मिकी माउस की बदौलत ही डिज़्नी का व्यवसाय 22 अरब डालर से ऊपर जा पहुँचा है। डिज़्नी दुनिया का एक बड़ा मीडिया समूह माना जाता है। मिकी माउस की रचना कर जीवित ही किवंदती बन चुके डिज़्नी का बचपन काफी अभावों में बीता। लेकिन अपनी कल्पनाशीलता और उद्यमशीलता की बदौलत उन्होंने अरबों डालर का साम्राज्य बनाया।
डिज़्नी अपनी प्रसिद्ध कृति मिकी माउस से ज्यादा पहचाने जाते थे। एक प्रसिद्ध उद्धरण से उनके एवं मिकी माउस की प्रसिद्धि का पता लगता है। 1950 के दशक में एक टॉक –शो में डिज़्नी का परिचय इन शब्दों में कराया गया। “ हमारे साथ इस सदी का सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति है जो संभवत: हमारी जिंदगी बदलने वाले राजनेताओं से भी ज्यादा जाना जाता हैं। यहाँ तक कि चर्चिल भी मिकी माउस जितने भी प्रसिद्ध नहीं होंगे।“
मिकी माउस ने हॉलीवुड में भी कई प्रतिमान स्थापित किए। डिज़्नी और हॉलीवुड का काफी लंबा रिश्ता रहा। मिकी माउस के योगदान को एनीमेटेड या कार्टून फिल्मों में भुलाया नहीं जा सकता। अमेरिकी फिल्म जगत का कोई कोना उसके प्रभाव से अछूता नही है। ऑस्कर पुरस्कार से भी उन्हें कई बार सम्मानित किया गया।
आज भी मिकी माउस नए-नए रुपों से बच्चे, युवाओं, बुढ़ों में समान रुप से लोकप्रिय है। आशा है, मिकी माउस अपने 80 वें जन्मदिन से जल्दी ही शती मनाएगा। गत 18 नवंबर को मिकी माउस के वेबसाइट पर बधाईयों का तांता लग गया था। मिकी माउस ‘’ तुम जियो हजार साल, साल के दिन हो पचास हजार ।‘’

हिन्दी का बदलता स्वरुप

कभी स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली हिन्दी आज देश की राष्ट्रीय, सांस्कृतिक व राजनैतिक एकता को मजबूत कर रही है। अपनी संपर्क भाषा की भूमिका के कारण हिन्दी हमें स्थानीयता और जातीयता से परे लेकर जाती है। हिन्दी का यह भाषायी विस्तार भारतीय समाज में व्याप्त क्षेत्रीय, जातीय व भाषायी दूराग्रह को समाप्त करने में काफी मददगार सिद्ध हो रहा है। बीते 15 वीं लोकसभा चुनावों के दौरान जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तथा वर्तमान विदेश मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने एक टी0 वी0 चैनल पर इंटरव्यूह देते हुए कहा कि देश चलाने के लिए हिन्दी का ज्ञान जरुरी है। तो इस कथन ने हिन्दी की राजनैतिक रुप स्वीकार्यता पर और ज्यादा मुहर लगा दी।

हिन्दी कई बाधाओं-अवरोधों के बावजूद लोकतांत्रिक तरीके से स्वत: ही पूरे देश में फैल रही है। बोलना ही किसी भाषा को जीवित रखता हैं और फैलाता है। हिन्दी की इस भूमिका ने भारतीय जनमानस को राष्ट्रभाषा की कमी के अहसास से मुक्ति प्रदान की है। जैसे-जैसे हिन्दी भाषा की इस व्यापकता को स्वीकृति मिल रही है वैसे-वैसे उस पर देश की अन्य भाषाओं, बोलियों का प्रभाव भी स्पष्ट नजर आ रहा है। हिन्दी भाषा का फैलाव अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक हो गया है। सामान्यतया, यही माना जाता था कि हिन्दी की यह आंचलिकता बिहार की बोलियों, हरियाणवी तथा पंजाबी तक ही सीमित है। लेकिन, हिन्दी अपने भाषायी विस्तार के दौर में न केवल गुजराती, मराठी, बंगाली, उड़िया, तमिल, तेलगू आदि भाषाओं के संपर्क में आई है बल्कि इसकी पहुँच पूर्वोत्तर राज्यों की भाषाओं तक हो गई है। इसीलिए, आजकल पंजाबी से गृहित ‘मैंने जाना है या मैंने किया हुआ है’ का प्रयोग आंचलिकता नहीं माना जाता बल्कि इसे हिन्दी का भाषायी विस्तार माना जाता है। आंचलिकता के कारण हिन्दी के कई रुप प्रचलित हो गए है जिसे हम अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रुपों में देख सकते है। हिन्दी क्षेत्रों में भी एक ही चीज के लिए अलग-अलग शब्द प्रयोग किए जाते रहे है। जैसे, मध्यप्रदेश में शासकीय

महाविद्यालय या यंत्री(इंजीनियर) का प्रयोग तथा बस रखने के स्थान को किसी राज्य में डिपो तो कही आगार कहते है।
आज हिन्दी अपने राष्ट्रीय स्वरुप में दक्खिनी हिन्दी, हैदराबादी हिन्दी, अरुणाचली हिन्दी आदि में विस्तारित हो गई है। दक्षिण भारतीय हिन्दी के स्वरुप को हम भले ही मजाकिए अंदाज में हिन्दी सिनेमा में देखते है लेकिन इसे भी हिन्दी का विस्तार माना जाता है। स्पष्टतया, आज हिन्दी सार्वत्रिक रुप से संपूर्ण भारत की भाषा बन गई है। हिन्दी का यह अखिल भारतीय स्वरुप भारत के दक्षिण से उत्तर की ओर तथा भारत के पूर्व से पश्चिम की ओर आ रही है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैली हिन्दी का यह जबानी फैलाव एक दिन लिपि के स्तर पर भी होगा।
इस भाषायी विस्तार के कारण हिन्दी में केवल भारतीय भाषाओं के शब्द ही नही आए है बल्कि इसका फैलाव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी आप्रवासियों की हिन्दी में देखा जा सकता हैं। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम के अतिरिक्त जमैका, टोबैगो और गुयना जैसे भारतवंशी देश भी है। जहाँ की पचास फीसदी से ज्यादा आबादी तो कहीं पचास फीसदी से कम लोग मातृभाषा के रुप में हिन्दी का प्रयोग करते है। सूरीनाम की हिन्दी में ‘हमरी बात समझियो’ जैसा प्रयोग मानक हिन्दी माना जाता है। तो, मारीशस में ‘मैं बुटिक जा रहा हूँ (मैं दुकान जा रहा हूँ)’ जैसा प्रयोग सहज स्वाभाविक है। हिन्दी के बोलचाल के सैकड़ो शब्द मॉरीशस की भाषा क्रियोल में आ गये है। फीजी की मुख्य भाषा भी फीजी बात(फीजी हिन्दी) है। जिसका प्रयोग वहां की संसद में भी होता है। लेकिन फीजी बात से परिचित कोई भी व्यक्ति यह जानता है कि वह किस प्रकार के आंचलिक प्रयोगों से युक्त हिन्दी है। अमेरिका, कनाडा जैसे देशों में आप्रवासियों की बड़ी आबादी कुछ दूसरे प्रकार की हिन्दी बोलती है। यह भी आधुनिक हिन्दी का ही विस्तार है। अमेरिका तथा ब्रिटेन के हिन्दी रेडियो कार्यक्रमों में भारतीय रेडियो कार्यक्रमों से ज्यादा गुणवत्ता नज़र आती है।
हिन्दी भाषा के बदलते स्वरुप को हम मीडिया के बहाने भी देख सकते है। मीडिया ने भी हिन्दी के इस नए रुप को गढ़ने में पर्याप्त सहयोग किया है। कारण कि भाषाएं संस्कृति की वाहक होती है और इन दिनों इलेक्ट्रानिक मीडिया पर प्रसारित हो रहे कार्यक्रमों से समाज के बदलते सच को हिन्दी के बहाने ही उजागर किया जा रहा है। ऐसे कार्यक्रमों में राखी का स्वंयवर, बालिका वधू, इस जंगल से मुझे बचाओं, सच का सामना, अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो, आदि के नाम गिना सकते है। इन कार्यक्रमों की लोकप्रियता से भी हिन्दी भाषा की बढ़ती स्वीकार्यता का अंदाजा लगा सकते है। हिन्दी मीडिया भी दिनों-दिन प्रगति की ओर बढ़ रही है। देश के मीडिया उद्योग का भी एक बड़ा हिस्सा हिन्दी मीडिया उद्योग का है।
प्रश्न यह है कि हिन्दी के इस विराट स्वरुप को तकनीकी व व्याकरणिक स्वीकृति कैसे मिले ? हिन्दी का यह स्वरुप अपने-अपने क्षेत्रीय संदर्भ में हिन्दी को आत्मीय बनाता है। जिसके कारण हिन्दी का प्रयोगकर्त्ता एक खास तरह का भाषिक अपनापन अनुभव करता है। लेकिन, हिन्दी का यह स्वरुप हिन्दी को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेकानेक बोलियों में बदल रही है। यह तथ्य कई शुद्धतावादियों को आपत्तिजनक भी लगती है।
किंतु, जैसा कि डॉ. रामविलास शर्मा ने कहा है- “ बोलियां ही हिन्दी की सबसे बड़ी शक्ति है। एक हिन्दी वह है जो अपने मानक रुप में अपनी सरलता और नियमबद्धता के कारण राष्ट्रीय और क्षेत्रीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय भाषा तक है। दूसरी हिन्दी वह है जो आंचलिक और क्षेत्रीय प्रकार की है। यह हिन्दी मानक हिन्दी के लिए शब्दों और प्रयोगों का अक्षय भंडार है। मानक हिन्दी का वहीं अंश गृहीत होता है जो इसके राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बोधगम्य होने में बाधक नहीं है। नमनीयता और अनुशासनबद्धता ऐसे परस्पर विरोधी ध्रुव है जिनके बीच दुनियाभर के बीच बड़ी भाषाएं काम करती है। हिन्दी का सच भी यही है। “
ऐसे में यह अत्यावश्यक है कि हिन्दी के इस नए स्वरुप को मानकीकृत किया जाए। सरकार को भी चाहिए कि वह सभी प्रमुख भाषाविदों से विचार-विमर्श करके हिन्दी का एक ऐसा मानक शब्दकोश तैयार करें जिसमें वर्तमान में प्रयोग किए जा रहे सभी शब्दों का समावेश हो तथा इस शब्दकोश में आम बोलचाल में स्वीकृत दूसरी भाषा के शब्दों को आसानी से जगह मिले। जिस प्रकार अंग्रेजी भाषा अपनी लोचता के कारण अंतर्राष्ट्रीय भाषा बन गई है तथा प्रत्येक वर्ष ऑक्सफोर्ड शब्दकोष में अंग्रेजी भाषा में स्वीकार्य शब्दों को अपनी शब्दावली में आसानी से जगह देता है ; उसी प्रकार हिन्दी शब्दकोष में भी दूसरी भाषा के शब्दों को आसानी से जगह मिले। तभी, हिन्दी को ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता मिलेगी। साथ ही हिन्दी की इस स्वीकार्यता से हमारी भाषायी अस्मिता को भी सम्मान मिलेगा और हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने का हमारा दावा पुख्ता होगा।

Saturday, September 20, 2008

why terrosim occurs in india

since last two decades we are facing terrosim in india. govt is sleeping. common man are punished why